भोपाल। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर परिवर्तन मार्ग की ओर से कोहेफिजा स्थित नाज़ एन्क्लेव में ‘स्टोरीटेलिंग एंड मेंटल हेल्थ एक्सप्रेशंस सेशन’ आयोजित किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने अपनी जिंदगी के संघर्षों, भावनात्मक चुनौतियों और व्यक्तिगत अनुभवों को कहानियों के माध्यम से साझा कर मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का संदेश दिया।
सत्र में अपनों को खोने, सामाजिक दबाव, शैक्षणिक चुनौतियों, लैंगिक भेदभाव, बॉडी शेमिंग और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा हुई। वक्ताओं ने बताया कि मुश्किल परिस्थितियों में आत्मविश्वास, अपनों का सहयोग और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञों की मदद जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकती है।
कुदसिया सुल्तान सिद्दीकी ने कम उम्र में अपनों को खोने के बाद आत्मनिर्भर बनने की अपनी यात्रा साझा की, जबकि अक्षत ने ओवरथिंकिंग से बचने और सकारात्मक गतिविधियों में शामिल रहने के महत्व पर जोर दिया। रिसर्च स्कॉलर निदा मतीन ने मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ सहायता लेने की आवश्यकता बताई।
आशीष शाक्य ने शैक्षणिक दबाव और अवसाद से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए ‘नेवर गिव अप’ का संदेश दिया। वहीं, नाज़ बी ने कम उम्र में विधवा होने और सामाजिक चुनौतियों के बीच अपने बच्चे के भविष्य के लिए संघर्ष की कहानी सुनाई। श्रिंगा श्रीवास्तव ने कविता के माध्यम से रंगभेद संबंधी टिप्पणियों और बॉडी शेमिंग के भावनात्मक प्रभाव को व्यक्त किया। आलिया खान और एना छाबड़िया ने महिलाओं की सुरक्षा तथा एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझने की जरूरत पर विचार रखे। योगिता भारती ने कठिन समय में सहयोग और संवेदनशीलता की अहमियत साझा की।
डॉ. निधि साहू ने दिया आत्मचिंतन का संदेश
कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि डॉ. निधि साहू ने आत्मचिंतन, आत्मकरुणा और स्वयं के प्रति संवेदनशील रहने पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “प्रश्न कितने भी हों, उत्तर हमेशा अंदर ही मिलेगा। अगर जीवन में कोई सिरा कहीं गुम हो गया है, तो उसे ढूँढ़ना है, सराहना है और तराशना है।”
कार्यक्रम का संचालन अंकिता डे ने किया, जबकि सना अज़हर ने समापन पर सभी वक्ताओं और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। आयोजन में सना अज़हर, अंकिता डे, निदा मतीन, दुहा मतीन, जुबैर अख्तर, अवीक मौर्य और औरंगज़ेब आज़म की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
परिवर्तन मार्ग की इस पहल ने संदेश दिया कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक और संवेदनशील समाज बनाने के लिए लोगों की बात सुनना, उनके अनुभवों को समझना और बिना किसी पूर्वाग्रह के उन्हें स्वीकार करना जरूरी है।